“न्याय के लिये कानून का भी बलिदान करना पड़ता है”- भगत सिंह कोश्यारी
“न्याय में न देर हो, न अंधेर हो”- प्रोफेसर डॉ. अनिल कुमार दीक्षित
“विधि के छात्र न्यायिक निर्णयों के प्रति जागरूक रहें”- न्यायमूर्ति राकेश टंडन
देहरादून। न्याय, विधि और संवैधानिक मूल्यों पर केंद्रित गुजराल फाउंडेशन द्वारा आयोजित “ज्यूरिस्ट कॉन्क्लेव” न्यायिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा, जहां न्याय व्यवस्था, विधिक सुधार, नैतिक उत्तरदायित्व और न्यायिक संवेदनशीलता पर गंभीर मंथन हुआ। कार्यक्रम में न्यायपालिका, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं और समाजसेवियों ने अपने विचार साझा किए।
उद्घाटन सत्र में महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भारतीय न्याय व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि न्याय केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य समाज में वास्तविक न्याय की स्थापना होना चाहिए। उन्होंने कहा, “कई परिस्थितियों में न्याय की स्थापना के लिए कानून का भी बलिदान करना पड़ता है।” उनका वक्तव्य न्याय की संवेदनशीलता और उसके व्यापक सामाजिक संदर्भ को रेखांकित करता दिखाई दिया।
न्यायमूर्ति राकेश टंडन ने विधि के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले निर्णयों के प्रति जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि न्यायिक निर्णय केवल कानून के दस्तावेज नहीं होते, बल्कि वे समाज की दिशा और न्याय की संस्कृति को भी निर्धारित करते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से न्यायिक प्रणाली की गहराई को समझने और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सजग रहने का आह्वान किया।
देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के विधि विभाग के अधिष्ठाता प्रोफेसर (डॉ.) अनिल कुमार दीक्षित ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा, “न्याय में न देर हो और न ही अंधेर हो।” उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था की मजबूती के लिए अधिवक्ता पक्ष और न्यायपीठ दोनों को अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करना होगा। उनके विचारों ने न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता की आवश्यकता को प्रमुखता से सामने रखा।

पूर्व न्यायिक अधिकारी श्री महेश्वरी ने कहा कि न्याय में अनावश्यक विलंब संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि विलंबित न्याय कई बार न्याय से वंचित कर देता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। कार्यक्रम के दौरान देहरादून जिला न्यायालय के जनपद न्यायाधीश प्रेम सिंह को उनकी सेवानिवृत्ति के अवसर पर सम्मानित किया गया। फाउंडेशन की अध्यक्ष ऋतु गुजराल ने उन्हें सम्मान अर्पित करते हुए उनके न्यायिक योगदान की सराहना की। इसी अवसर पर उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार को भी उनके उत्कृष्ट प्रशासनिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया।सम्मेलन में उत्तराखंड के वरिष्ठ अधिवक्ता, विधि क्षेत्र से जुड़े शिक्षाविद, समाजसेवी और अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। भाजपा प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत भारद्वाज ने आयोजन की सफलता का श्रेय फाउंडेशन की सतत मेहनत, समर्पण और समाज के प्रति उत्तरदायी दृष्टिकोण को दिया।
यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि न्याय, संवैधानिक मूल्यों और विधिक चेतना पर गंभीर चिंतन का सशक्त मंच बनकर सामने आया। यहां व्यक्त विचारों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि एक सशक्त, संवेदनशील और समयबद्ध न्याय व्यवस्था ही लोकतंत्र की वास्तविक आधारशिला है।











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