झाँसी। हर वर्ष जब विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जाता है, तब झांसी की ऐतिहासिक विरासत और पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारियों पर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं। मंचों से जागरूकता की बातें होती हैं, योजनाओं के दावे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि ये सभी बातें केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं। ज़मीनी स्तर पर न तो ऐतिहासिक धरोहरों को संवारने की कोई ठोस पहल दिखाई देती है और न ही उन्हें अवैध कब्ज़ों और तोड़फोड़ से बचाने की गंभीर कोशिश।
झाँसी का रानी महल हो या रानी लक्ष्मीबाई का ऐतिहासिक किला चारों ओर अवैध निर्माण का घेरा लगातार कसता जा रहा है। इन अवैध निर्माणों ने न सिर्फ ऐतिहासिक धरोहरों की सुंदरता को नष्ट कर दिया है, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें निगलने का काम भी शुरू कर दिया है।

हाल ही में कोतवाली थाने के समीप झाँसी किले की संरक्षित सीमा से लगभग सौ मीटर की परिधि में पुराने निर्माण को अवैध रूप से तोड़कर नया निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि न तो पुराने निर्माण को तोड़ने की अनुमति पुरातत्व विभाग से ली गई और न ही नए निर्माण की कोई स्वीकृति प्राप्त की गई।
इस पूरे मामले में केंद्रीय पुरातत्व विभाग के उप अधीक्षक समीर दीवान ने स्वयं स्वीकार किया है कि अवैध निर्माण को रुकवाने के लिए जिला प्रशासन और पुलिस को पहले ही पत्र भेजे जा चुके हैं। इसके बावजूद न तो प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया और न ही पुलिस ने अवैध निर्माण को रोकने की कोई ठोस कार्रवाई की।
पुरातत्व विभाग द्वारा बार-बार पत्र भेजे जाने के बाद भी यदि ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित नहीं किया जा रहा है, तो यह स्थिति कहीं न कहीं प्रशासनिक लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की ओर साफ इशारा करती है। सवाल यह है कि जब संरक्षित धरोहरें ही सुरक्षित नहीं हैं, तो विश्व धरोहर सप्ताह मनाने का औचित्य आखिर क्या रह जाता है?












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