नर से नारायण बनने की साधना का संदेश: भोपाल में संत सिंगाजी महाराज की पांच दिवसीय परचारी कथा में उमड़ा श्रद्धा-सागर

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भोपाल। आध्यात्मिक चेतना और आत्मकल्याण की दिव्य अनुभूति से ओतप्रोत मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित संत सिंगाजी महाराज की परचारी कथा श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपम संगम बनकर उभरी। संत सिंगाजी महाराज की वाणी, अनुभव और विचारों में निहित वह शक्ति, जो नर को नारायण बनने की प्रेरणा देती है, कथा के प्रत्येक प्रसंग में सरल, सूक्ष्म और प्रभावी रूप में प्रकट हुई।

कथा में बताया गया कि संत सिंगाजी महाराज के आचार, विचार और संस्कार मानव जीवन को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाले हैं। उनका संपूर्ण जीवन भक्ति, सेवा और समाज कल्याण को समर्पित रहा। महाराज का अवतरण मानव समाज के कल्याण, भक्ति के प्रचार-प्रसार और धरती से अधर्म व अज्ञान के भार को कम करने के लिए हुआ, यह भाव कथा के केंद्र में रहा।

इस पावन आयोजन में मुख्य अतिथि जीजी माँ दीप्ति परमेश्वरी सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि “संत सिंगाजी महाराज की साधना केवल तपस्या नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। उनकी शिक्षाएँ आज के भौतिक युग में मानव को आत्मिक शांति, संयम और करुणा का मार्ग दिखाती हैं। जब मनुष्य अपने भीतर भक्ति, सेवा और सत्य को जागृत करता है, तभी नर से नारायण बनने की यात्रा प्रारंभ होती है।” उन्होंने कहा कि संतों की वाणी समाज को जोड़ने वाली शक्ति है और ऐसे आध्यात्मिक आयोजनों से नई पीढ़ी को संस्कार, संस्कृति और आत्मबोध का अमूल्य मार्गदर्शन मिलता है।

कार्यक्रम में नीरज सिंह, निर्गुण धाम सेवा समिति के अध्यक्ष विक्रम सिंह छिछोरियां तथा समिति के सचिव संजय खंडेलवाल सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन को सफल बनाने में समिति के पदाधिकारियों और सेवाभावी कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

पांच दिवसीय परचारी कथा का रसपान निमाड़ के सुप्रसिद्ध कथा वाचक नितेश साद गुर्जर द्वारा कराया गया। उन्होंने संत सिंगाजी महाराज के अद्भुत चमत्कारों, उनकी नर से नारायण बनने की आध्यात्मिक यात्रा तथा समाधि प्रसंग का भावपूर्ण और ओजस्वी वर्णन किया। कथा के प्रत्येक दिन श्रोताओं ने भक्ति रस में डूबकर आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव किया।

कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने संत सिंगाजी महाराज की शिक्षाओं की मुक्त कंठ से सराहना की और महाराज से आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को कृतार्थ महसूस किया। पूरा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना से सराबोर हो उठा। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक कथा रहा, बल्कि आत्मकल्याण, सदाचार और मानवता के उत्थान का सांस्कृतिक संदेश देने वाला आध्यात्मिक महोत्सव सिद्ध हुआ।

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