झाँसी। शहर में सरकारी जमीन के नाम पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की नींद भी उड़ा दी है, जिन्होंने जीवन भर की जमा पूंजी और कर्ज के सहारे अपने सपनों का आशियाना बसाने की कोशिश की थी। मामला मौजा झाँसी खास की आराजी संख्या 1370 से जुड़ा है, जहां नगर निगम के अनुसार सरकारी जमीन के हिस्सों को छिपाकर और कागजों में हेरफेर कर फर्जी तरीके से बैनामे कराए गए। नगर निगम की शिकायत पर थाना कोतवाली में 28 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।
नगर निगम का आरोप है कि इस खसरा नंबर में शामिल जमीन के कुछ हिस्सों को निजी बताकर ऐसे दस्तावेज तैयार किए गए, जिनके आधार पर एक के बाद एक रजिस्ट्री कर दी गईं। यही नहीं, इन सौदों में कथित रूप से वास्तविक स्थिति छिपाई गई और सरकारी संपत्ति को निजी बताकर बेचने की कोशिश की गई।

सरकारी जमीन का बड़ा हिस्सा, फिर भी बेच दी गई- नगर निगम के अनुसार खसरा संख्या 1370 का कुल क्षेत्रफल करीब 20.95 एकड़ है। रिकॉर्ड के मुताबिक इसमें अलग-अलग तरह की प्रविष्टियां दर्ज हैं। निगम का कहना है कि इसी खसरा नंबर में करीब 3.882 हेक्टेयर जमीन राज्य सरकार की संपत्ति है, जिसका प्रबंधन और देखरेख नगर निगम के जिम्मे है। यह खसरा “मिनजुमला” श्रेणी में आता है, यानी इसमें कई हिस्से और रिकॉर्ड जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में जमीन का विभाजन स्पष्ट न होने से विवाद की संभावना बढ़ जाती है, और इसी स्थिति का फायदा उठाकर कथित रूप से फर्जीवाड़ा किया गया।

कोर्ट में पहले से चल रहा था मामला, फिर भी कर दी गईं रजिस्ट्री- नगर निगम ने बताया कि इस जमीन को लेकर पहले से सिविल कोर्ट में वाद संख्या 593/2020 के तहत विवाद लंबित है। कोर्ट ने 09 मार्च 2021 को जमीन पर “यथास्थिति” बनाए रखने का आदेश दिया था। यानी जमीन जैसी स्थिति में है, वैसी ही रहे, कोई नई खरीद-बिक्री, निर्माण या हस्तांतरण न हो। लेकिन नगर निगम का आरोप है कि स्टे के बावजूद कुछ लोगों ने इस जमीन के हिस्सों के बैनामे कराए और रजिस्ट्री करा दीं। निगम ने कई पंजीकृत बैनामों की प्रतियां जुटाईं और उनका सत्यापन कराया। सत्यापन में सामने आया कि 09 मार्च 2021 के बाद भी कई रजिस्ट्री हुईं, जो कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना बताई जा रही है।

भोली जनता को दिखाया सपना, फिर छीन लिया चैन- इस पूरे मामले का सबसे दर्दनाक पहलू वह है, जो अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है। नगर निगम के अनुसार जिन लोगों ने कथित रूप से फर्जीवाड़ा किया, उन्होंने भोली-भाली जनता को भरोसे में लेकर उन्हें जमीन के नाम पर बड़ा सपना दिखाया “सस्ता प्लॉट”, “साफ कागज”, “तुरंत रजिस्ट्री” और फिर उन्हीं मासूम लोगों को ऐसी रजिस्ट्री थमा दी, जो अब विवादों में फंस चुकी है।
सबसे अधिक चोट उन परिवारों को लगी है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। कई ऐसे लोग बताए जा रहे हैं जिन्होंने कर्ज लेकर जमीन खरीदी, कुछ ने घर बनवाना शुरू कर दिया, किसी ने ईंट-सीमेंट जोड़ा, किसी ने अपनी बेटी की शादी या बच्चों की पढ़ाई की रकम से बचाकर प्लॉट लिया। आज वही लोग सदमे में हैं कि जिस जमीन पर उन्होंने अपनी जिंदगी की जमा पूंजी लगा दी, वह जमीन सरकारी बताई जा रही है और उनके कागज फर्जी निकल सकते हैं।
यह केवल जमीन का विवाद नहीं है, यह गरीबों की मेहनत की कमाई पर डाका है। यह उन सपनों की हत्या है, जो किसी मजदूर ने दिन भर की दिहाड़ी के बाद देखे थे, किसी छोटे दुकानदार ने अपनी बचत जोड़कर सजाए थे, किसी कर्मचारी ने हर महीने की किस्त काटकर पाले थे।

शक की सुई अधिकारियों तक भी: बिना मिलीभगत इतना बड़ा खेल कैसे?- अब इस पूरे प्रकरण में एक और गंभीर सवाल भी उठ रहा है। चर्चा है कि क्षेत्रीय लेखपाल एवं अन्य संबंधित अधिकारियों की संभावित मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर जमीन के कागजों में हेरफेर और फर्जीवाड़ा आखिर कैसे संभव हो सकता है? लोगों का कहना है कि जब मामला सरकारी जमीन से जुड़ा है, रिकॉर्ड “मिनजुमला” श्रेणी में है, और पहले से कोर्ट में केस भी चल रहा था, तब फिर रजिस्ट्री होना कई संदेह खड़े करता है। यह सवाल भी बार-बार सामने आ रहा है कि बिना राजस्व रिकॉर्ड की जानकारी, जांच-पड़ताल और मौके की स्थिति देखे बिना इतने बड़े पैमाने पर बैनामे कैसे हो गए? यदि किसी स्तर पर लापरवाही नहीं हुई, तो फिर यह पूरा फर्जीवाड़ा किसकी निगरानी में और किसके संरक्षण में आगे बढ़ा?
नगर निगम और स्थानीय लोगों की मांग है कि इस मामले की जांच सिर्फ खरीदार-बिक्री करने वालों तक सीमित न रहे, बल्कि राजस्व विभाग के संबंधित कर्मचारियों, लेखपाल, और अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी गहराई से जांच की जाए, ताकि सच सामने आ सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।

सवाल यह नहीं कि मुकदमा दर्ज हुई, सवाल यह है कि कार्रवाई कब होगी?- नगर निगम की शिकायत पर 28 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना जरूर एक कदम है, लेकिन शहर में अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—जिन लोगों ने गरीबों को चूना लगाया, उन्हें कब गिरफ्तार किया जाएगा?किसने फर्जी दस्तावेज बनाए?किनकी मदद से रजिस्ट्री हुई?और पीड़ित लोगों का पैसा कौन लौटाएगा?लोग कह रहे हैं कि दोषियों पर कार्रवाई सिर्फ कागजों तक नहीं होनी चाहिए, बल्कि जो भी इस फर्जीवाड़े का हिस्सा रहा, चाहे वह दस्तावेज तैयार करने वाला हो, सौदा कराने वाला हो, या गलत जानकारी देकर रजिस्ट्री करवाने वाला उसकी जवाबदेही तय हो।
नगर निगम ने पुलिस से की सख्त कार्रवाई की मांग– नगर निगम ने थाना कोतवाली में दी गई रिपोर्ट में मांग की है कि जिन-जिन लोगों ने अवैध तरीके से बैनामे कराए हैं या कराने में सहयोग किया है, उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए। निगम का कहना है कि यह मामला सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, रिकॉर्ड में हेरफेर करने और नियमों को तोड़कर जमीन बेचने से जुड़ा है, इसलिए इसकी निष्पक्ष और गहन जांच आवश्यक है।












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