जब कानून फाइलों में सो जाए और सड़कें हों माफिया के हवाले

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झाँसी। सूचना के अधिकार के तहत सामने आए तथ्य कोई साधारण आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे उस सच्चाई का आईना हैं जिसे आम आदमी रोज़ सड़कों पर देखता है और सिस्टम नजरअंदाज करता है। झांसी में बिना नंबर प्लेट दौड़ती ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर एक साल में महज़ 28 कार्रवाइयाँ; यह आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता की स्वीकारोक्ति है।

जब सैकड़ों ट्रैक्टर-ट्रॉलियां खुलेआम बिना पंजीकरण संख्या, बिना फिटनेस और बिना बीमा के सड़कों पर दौड़ती दिखती हैं, तब यह मान लेना कठिन नहीं कि प्रवर्तन व्यवस्था या तो कमजोर है या फिर इच्छाशक्ति का अभाव है। RTI के जवाब बताते हैं कि कार्रवाई का दावा तो है, लेकिन अवैध परिवहन की जड़ पर चोट करने की कोई ठोस रणनीति मौजूद नहीं है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि अवैध बालू, मिट्टी और ईंट परिवहन जैसे संगठित अपराध को रोकने के लिए कोई विशेष अभियानात्मक निर्देश तक नहीं हैं। यानी सिस्टम को यह समस्या दिखती तो है, लेकिन वह इसे प्राथमिकता मानने को तैयार नहीं। जब नीति ही ढीली हो, तो मैदान में सख्ती की उम्मीद बेमानी हो जाती है। और उससे भी चिंताजनक है विभागीय तालमेल का अभाव। परिवहन, खनन और पुलिस—तीनों अलग-अलग खेमों में खड़े नजर आते हैं। RTI के काग़ज़ साफ कहते हैं कि आपसी समन्वय नाम मात्र का भी नहीं है। इस खामोशी का फायदा वही उठाता है, जो कानून से नहीं, सिस्टम की कमजोरी से ताकत पाता है।

यह सिर्फ राजस्व की चोरी का मामला नहीं है, यह सीधे-सीधे सड़क सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। बिना जांचे-परखे वाहन, ओवरलोड ट्रॉलियां और अनियंत्रित परिवहन; ये सब किसी भी दिन किसी बड़े हादसे की भूमिका तैयार कर सकते हैं। तब सवाल सिर्फ “कौन जिम्मेदार?” का नहीं होगा, बल्कि “पहले क्यों नहीं रोका गया?” का होगा।

RTI ने किसी पर आरोप नहीं लगाया, लेकिन सिस्टम को कटघरे में जरूर खड़ा कर दिया है। अब यह प्रशासन पर निर्भर करता है कि वह इन तथ्यों को सुधार का अवसर मानता है या फिर एक और फाइल बनाकर अलमारी में बंद कर देता है।क्योंकि अगर कानून काग़ज़ों में सख्त और सड़कों पर लाचार रहेगा, तो जनता का भरोसा कानून से नहीं, व्यवस्था से उठ जाएगा; और यही किसी भी शासन व्यवस्था के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है।

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